ये शायरी है की जिंदगी? 🙏
रंग सब धुंदले थे लेकिन तीरगी इतनी न थी
ज़िंदगी पहले भी टूटी थी मगर बिखरी न थी
आइने के पास जो चेहरा था वो मेरा ही था
आइने में शक्ल जो उभरी थी वो मेरी न थी
इस तरह रखते थे हम दोनों तअल्लुक़ का भरम
टूट भी जाते थे और आवाज़ भी होती न थी
- शकील आज़मी
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