भए कुमार जबही सब भ्राता।
दीन्हजनेऊ गुरु पितु माता।।
गुर गृह गए पढ़न रघुराई।
अलप काल विद्या सब आई।।
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी।
सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।।
विद्या विनय निपुनी गुन सीला।
खेलहि खेल सकल नृप लीला।।
राम सियाराम सियाराम जय जय राम
जय श्री राम 🚩🚩🙏🌹🌹
*जिस प्रकार सांप अपनी केंचुली और*
*गिरगिट रंग बदलना कभी नहीं छोड़ता,*
*ठीक उसी प्रकार छल-कपट से भरा व्यक्ति*
*अपना कुटिल स्वभाव कभी नहीं छोड़ता,*
*चाहे उसके शब्द कितने ही मीठे क्यों न हों!*
राधे कृष्णा