ॐ श्री अमृताय नमो नमः। 🪷
वह जो कि अविनाशी हैं, अमर हैं, जिनका कभी नाश नहीं हो सकता, और जो भक्तों को अमरत्व प्रदान करते हैं, ऐसे भगवान अमृत श्री हरि को बार बार नमस्कार है। 🌼🌸
जय श्री हरि। परमा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं। 🙏#ParamaEkadashi
सीता राम चरण रति मोरे। अनु दिन बढ़उ अनुग्रह तोरे।।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।।
श्री सीता-रामजी के चरणों में मेरा प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे। हे श्री नाथ जी,जिस प्रकार भी मेरा हित हो,आप शीघ्रता से उस संपन्न कीजिए,मैं तो आपका दास हूँ।।
#जय_श्रीराम
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योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।6.10।।
शरीर और मन को संयमित किया हुआ योगी एकान्त स्थान पर अकेला रहता हुआ आशा और परिग्रह से मुक्त होकर निरन्तर मन को आत्मा में स्थिर करे।।
जय श्री हरि।
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यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।
जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।
ॐ श्री हरिः।
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आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।6.3।।
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मुनि के लिए कर्म करना ही हेतु (साधन) कहा गया है और योगारूढ़ हो जाने पर उसी पुरुष के लिए शम (शांति, संकल्पसंन्यास) को साधन कहा गया है।।
जय श्री हरि।
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यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।
जो स्थान ज्ञानियों द्वारा प्राप्त किया जाता है, उसी स्थान पर कर्मयोगी भी पहुँचते हैं इसलिए जो पुरुष सांख्य और योग को (फलरूप से) एक ही देखता है, वही वास्तव में देखता है।।
ॐ श्री हरिः।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।4.21।।
जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।
ॐ श्री हरिः। 🙏
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।5.23।।
जो मनुष्य इसी लोक में शरीर त्यागने के पूर्व ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी (युक्त) और सुखी मनुष्य है।।
ॐ श्री हरिः।
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