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*मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है:-*
_"ख्वाहिश नहीं, मुझे_
_मशहूर होने की,"_
_आप मुझे "पहचानते" हो,_
_बस इतना ही "काफी" है!_
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,_
_जिसकी जितनी

