एक-एक पल कीमती, इसे समझिए आप।
समय तेज है भागता, उड़ता है ज्यों भाप।।
उड़ता है ज्यों भाप, थामकर इसको चलिए।
बीत गया इक बार, हाथ फिर कितना मलिए।।
कह 'स्वप्निल' कविराय, नींव रखिए निज कल की।
कसकर लीजे थाम, नब्ज़ अपने हर पल की।।
- शैलेन्द्र सिंह चौहान 'स्वप्निल'