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लाल साड़ी में जब से तुमने दिखना ही छोड़ दिया,
किसी भी रंग ने मेरे कपड़ों में टिकना ही छोड़ दिया।
जो वजह तुमने बताई वो वाजिब न थी,
मैंने तब से कविता लिखना ही छोड़ दिया।
मैं बेचैन होकर रोज बाजार जाता हूं, चेहरे देखने,
तुम्हारी परछाई ने आस-पास दिखना ही छोड़ दिया।
~ अज्ञात