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उन्हें नहीं मालूम कि मैं क्या बोल रही हूँ, क्यों बोल रही हूँ और मेरे बोलने में किसका ज़िक्र है, फिर भी जब मैं वहाँ बैठी थी तो दोनों दादी बड़े ग़ौर से मुझे सुन रहीं थीं, मानो उन्हें सब समझ आरहा हो। ये रिपोर्ट मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी, इसने झकझोर दिया था।
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