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तुम देते विविध सदा फल 'देव', था नाम तुम्हारा है इससे कृत-कृत्य ना तुमसे कौन हुआ हे सदगुरु देव! मिले जिससे।
भादो पदी चौथ को औवतरे थे, हमारी घड़ी कितनी सुनहरे थे।
सन् 1888 आज ही के दिन 'भाद्रपद चतुर्दशी' को सदाफल देव जी महाराज इस धरा धाम पर भव-तपीत जगजीवों के उद्धार के लिए आए थे।





